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Saturday, February 18, 2012

मदरसे में कुरान के साथ भगवत गीता की शिक्षा

मदरसे में कुरान के साथ भगवत गीता की शिक्षा वाराणसी। वाराणसी के एक मदरसे में सांप्रदायिक सौहार्द का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिलता है, जहां छात्रों को कुरान के साथ-साथ भगवत गीता की भी शिक्षा दी जा रही है। यह आदर्श स्थिति शहर के छतरपुर इलाके स्थित 45 साल पुराने बहरूल-उलूम मदरसा में देखने को मिल रही है, जहां छात्र कुरान की आयतों के साथ-साथ गीता के श्लोक भी पढ़ रहे हैं। मदरसा संचालक 60 वर्षीय हाजी मुख्तार अहमद ने बताया, कुरान के साथ हिंदू शास्त्रों को पढ़ाने के पीछे हमारा उद्देश्य छात्रों को दोनों धार्मिक पुस्तकों में बताई गई बातें बताना हैं, ताकि उन्हें जीवन में ढालकर वे अपना भविष्य बेहतर बना सकें। अहमद के मुताबिक, इससे वे दोनों धर्मग्रंथों में बताई बातों को एक-दूसरे से जोड़े सकेंगे और उनके मन में कुरान के साथ-साथ भगवत गीता के लिए भी सम्मान जागृत होगा। उन्होंने कहा, इस कदम के पीछे हमारा उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। दोनों धर्मग्रंथों में एक ही बात बताई गई है कि ईश्वर एक है।
वर्ष 1964 में स्थापित हुए इस मदरसे में करीब एक साल पहले भगवत गीता व अन्य हिंदू शास्त्रों की पढ़ाई शुरू हुई थी। अहमद के अनुसार, हमारा उद्देश्य मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाना है।
मदरसा पदाधिकारियों के मुताबिक, यहां छात्रों को चारों वेद- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद की भी शिक्षा दी जाती है। यहां करीब 2500 छात्र पढ़ते हैं। लड़कियों के लिए 12वीं तक शिक्षा की व्यवस्था है, जबकि लड़कों के लिए आठवीं तक पढ़ाई की सुविधा है। मदरसे में कई हिन्दू शिक्षक हैं, लेकिन फिलहाल यहां कोई हिन्दू छात्र नहीं पढ़ रहा।

Source  : http://www.jagran.com/spiritual/religion-6514.html

Wednesday, October 5, 2011

क्या हिंदू क्या मुसलमान, यहां तो जीते हैं सिर्फ इंसान

http://www.bhaskar.com/article/UP-hindu---muslim-will-be-alert-to-the-politics-the-bad-news-for-you-2479075.html?HF-4=


 
फैजाबाद। नसीम खान वैसे तो अपनी छोटी सी सिलाई की दुकान की आय से संतुष्ट हैं लेकिन हर वर्ष दशहरा से पहले वह थोड़े से चिंतित हो जाते हैं। गांव में दशकों से हो रही रामलीला का आयोजन सुचारू रूप से हो सके इसलिए उन्हें बड़े पैमाने पर मिले काम लेकर ज्यादा पैसों का बंदोबस्त करना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के मुमताज नगर गांव में नसीम की तरह दूसरे मुसलमान भी रामलीला के आयोजन में दिल खोलकर चंदा देकर सालों से चली आ रही इस परम्परा को संजोए हुए हैं। दशकों से मुसलमान इस रामलीला का आयोजन करते आ रहे हैं।

नसीम खान ने कहा, "हमें गर्व है कि हम इस तरह की परम्परा निभा रहे हैं, जो सही अर्थो में आपसी भाईचारे को मजबूत करती है। हर साल दशहरे पर जब हम लोग रामलीला का आयोजन करते हैं तो हम में ऐसी भावनाएं उमड़ती हैं कि जैसे हम ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। आखिरकार हिंदू भाई भी तो उसी ईश्वर की संतान हैं।"

रामलीला का आयोजन रामलीला रामायण समिति के बैनर तले होता है। अब से करीब 47 साल पहले गांव के मुसलमानों ने मिलकर आपसी भाईचारे को मजबूत करने के उद्देश्य से इस समिति का गठन किया था। मुमताजनगर गांव की आबादी करीब 600 है जिसमें से तकरीबन 65 फीसदी मुसलमान समुदाय के लोग हैं।

समिति के अध्यक्ष माजिद अली ने कहा, "एक मुस्लिम बहुल गांव होने के मद्देनजर मुस्लिम त्योहारों के दौरान मुमताज नगर का महौल बहुत जीवंत और आकर्षक लगता था। गांव में हिंदुओं की आबादी को सीमित देखते हुए हमारे पूर्वजों ने सोचा कि उन्हें हिंदुओं के त्योहारों को बढ़ावा देने के लिए कुछ करना चाहिए। फिर उन्होंने 1963 में रामलीला के आयोजन की शुरुआत की, जो तब से लगातार जारी है।"

अली कहते हैं कि मुसलमान समुदाय के विभिन्न वर्गो के लोग इस समिति के सदस्य हैं। कम आय होने के बावजूद गांव के मुसलमान रामलीला के आयोजन में हर तरह से आर्थिक मदद देते हैं। जो लोग चंदा देने में असफल होते हैं वे रामलीला के आयोजन में श्रमदान देते हैं।

गांव के मुसलमान केवल आर्थिक सहयोग और श्रमदान के जरिए रामलीला के आयोजन तक ही खुद को सीमित नहीं रखते बल्कि वे इसमें अभिनय भी करते हैं। अली ने बताया, "हमारे भाई-बंधु राम, सीता और रावण जैसे रामलीला के मुख्य किरदारों के अलावा मंच पर अन्य कई महत्वपूर्ण किरदार निभाते हैं।"

इस साल यहां रामलीला की शुरुआत एक अक्टूबर से हुई है, जो आठ तारीख तक चलेगी। रामलीला का आयोजन शुरुआत से ही गांव के किनारे एक मैदान में होता आ रहा है। पहले रामलीला का मंचन अस्थाई मंच पर होता था लेकिन कुछ साल पहले आपसी सहयोग से वहां पर एक सीमेंट का मंच बना दिया गया है।